दिल्ली में 24 मई को गूंजेगी सांस्कृतिक चेतना की हुंकार
500 जनजातियों के 2 लाख से अधिक प्रतिनिधि अपने सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं देवी परंपराओं के संरक्षण के लिए करेंगे कदमताल
आलीराजपुर ---अखिल भारतीय
वनवासी कल्याण आश्रम के तत्वाधान में जनजाति सुरक्षा मंच के बैनर तले तू, मैं- रक्त एक को स्वाभिमानी रंग में रंगते हुए दिल्ली के लाल किला मैदान पर देश के 500 से अधिक विभिन्न जनजातियों के लगभग 2 लाख से अधिक समाज के प्रतिनिधि एकत्रित होकर अपनी सांस्कृतिक आध्यात्मिक और देवी परंपराओं के संरक्षण का संकल्प लेंगे।
वस्तुत यह केवल एक आयोजन नहीं बल्कि भारत की प्राचीन जनजातीय चेतना,अस्मिता और सांस्कृतिक स्वाभिमान का विराट उद्घोष होगा।
उल्लेखनीय है कि जनजातीय समुदाय का यह आयोजन ऐसे समय हो रहा है जब वैश्वीकरण,बाजारवाद और सांस्कृतिक विघटन की दौर में जनजातीय समाज अपनी मूल पहचान, परंपराओं और जीवन मूल्यों को सुरक्षित करने के लिए संघर्ष करता दिखाई पड़ता है।
क्योंकि जनजाति समाज केवल एक सामाजिक वर्ग नहीं अपितु इस राष्ट्र की प्राचीनतम सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतिनिधि है। जल जंगल और जमीन के रक्षक के रूप में अपने दायित्व का सदियों से निर्वहन करने वाले जनजाति समाज प्रकृति पूजा, सामूहिक जीवन, मातृशक्ति का सम्मान, लोक देवताओं में आस्था और धरती के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाने वाला समाज है।
दिल्ली में होने वाले इस विराट जनजातीय समागम के माध्यम से जनजाति समाज अपनी परंपराओं को केवल यादों में नहीं अपितु जीवन व्यवहार में जीवित रखना चाहता है।
इस तरह का जनजाति समाज का समागम केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन का आधार नहीं होगा, बल्कि जनजाति समाज की आध्यात्मिक चेतना,सांस्कृतिक अधिकार और सामाजिक अस्तित्व की राष्ट्रीय अभिव्यक्ति बनेगा।
इस दौरान देश के विभिन्न राज्यों से आने वाली जनजातियां अपने पारंपरिक नृत्य, लोकगीतों, वेशभूषाओं और वाद्य यंत्रों के साथ देवी देवताओं की आराधना पद्धति एवं सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करेगी। जिसके माध्यम से यह सहज रूप से समझा जा सकता है कि काफी भिन्नताओं के बावजूद भी जनजाति समाज में एक साझा राष्ट्रीय आत्मा विराजमान है।
बताते चले की इस कार्यक्रम के माध्यम से समाज जन अपनी जड़ों से जुड़े रहे, और आने वाले वीडियो तक अपनी देवीय एवं सांस्कृतिक परंपराओं को सुरक्षित रखने के लिए राष्ट्रीय संकल्प लेते हुए संस्कृति और परंपराओं पर बढ़ते वैचारिक धार्मिक और सांस्कृतिक दबावों को नकारते हुए अपनी परम्परा और अपने स्वाभिमान को जिंदा रखेंगे।
इस समागम के माध्यम से जनजातीय समाज यह संदेश देगा कि भारतीय चेतना में जनजाति समाज कोई परिधि समुदाय नहीं बल्कि राष्ट्रीय की मूल सांस्कृतिक धारा का अभिन्न अंग है। यदि देश अपनी जड़ों प्रकृति और लोग जीवन से जुड़ी सभ्यताओं को सुरक्षित रखना चाहता है, तो जनजाति समाज की परंपरा और जीवन दृष्टि को सम्मान देना आवश्यक होगा।
ये बोले ---समागम का उद्देश्य जनजाति समाज अपनी जड़ों से जुड़े रहे एवं आने वाली पीढ़ियों तक अपनी देवीय एवं सांस्कृतिक परंपराओं को सुरक्षित रख सके।
डॉ दीपमाला रावत, विषय विशेषज्ञ,जनजाति प्रकोष्ठ लोक भवन भोपाल।